Medha Editor's Note: We encourage the authors who bring in linguistic diversity, as in the below article in Devnagari script. Authors are also encouraged to add an English (condensed) version to help those readers 'linguistically challenged'  in that script/language.

UPDATE: New English version [here , Thanks to the author.]

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Ramkatha- A Spiritual Interpretation

रामकथा

  • एक आध्यात्मिक विश्वलेषण

राघबेन्द्र झा

रामकथा देश-विदेश सब जगह प्रिय है. यहाँ तक कि उन देशों में जहाँ हिन्दू धर्मं मानने वालों की संख्या बहुत कम है वहां भी रामकथा अत्यंत लोकप्रिय है. उदहारण के तौर पर हम इंडोनेशिया, इरान या रूस को ही देख लें.  आखिर इसका क्या कारण है? मेरा यह मानना है कि रामकथा में कुछ ऐसी विशेषता है कि यह जन जन को प्रिय है. इसमें धर्मं, जाति, लिंग या और किसी तरह का भेद नहीं आता.

मेरे विचार में इस कथा कि विशेषता यह है कि रामकथा हरेक मनुष्य की कहानी है. इस बात पर   कुछ प्रकाश डालना चाहूँगा.

रामकथा आत्मा और परमात्मा की कथा होने के कारण जन जन की कथा है. भगवन श्री  कृष्ण ने गीता में कहा है कि आत्मा अजन्मा है.  भगवती सीता अजन्मा होने के कारण आत्मा की प्रतीक हैं. उनका परमात्मा (भगवान राम) से मिलन होता. जब तक सीता राम के साथ थीं तब तक वे प्रसन्न थीं

  • चाहे वे अयोध्या के राजमहल में निवास कर रहीं हों या वन वन भटक रहीं हों.

जब वे माया के प्रति आकर्षित हो जातीं हैं (माया सोने का मृग बन कर  आया था )   तब उनका परमात्मा से विछोह हो जाता है.  और वे बहुत दुःख पातीं हैं. दशानन उनका अपहरण कर लेता है. दशानन इस बात का सूचक है कि हम अपने अन्दर न झांक कर, माया से प्रेरित होकर बहिर्मुखी बन कर दसों दिशाओं में भटकते हैं या दसों इन्द्रियों के गुलाम बन जाते हैं. दशानन हम सब का अपहरण कर लेता है.

इस अवस्था में आत्मा को बहुत कष्ट होता है. भगवती सीता कष्ट पातीं हैं. और गौर कीजिये कि परमात्मा भी इस अवस्था में सुखी नहीं होते. उन्हें आत्मा का दुःख देख कर स्वयं दुःख होता है. आखिर वे  अनंत करुणाशील जो हैं. परमात्मा निरंतर प्रयास करते रहते हैं कि आत्मा को शांति मिले.

जब आत्मा की  तकलीफ असह्य हो जाती है तो परमात्मा गुरु को अपना दूत बना के भेजते हैं. रामकथा में गुरु हनुमानजी को बतलाया गया है.  गुरु के मिलन से आत्मा को कुछ शांति मिलती है. एक सच्चे गुरु की तरह हनुमानजी केवल दूसरों की भलाई के लिए ही कर्म करते हैं.

दशानन की नाभि में अमृत है. इस अमृत को सुखाये बिना दशानन से मुक्ति नहीं मिल सकती. माता के गर्भ में हम अपने नाभि से ही पोषण पाते हैं. और फिर दसों  दिशाओं या दसों इन्द्रियों के दैत्य दशानन के कब्जे में आ जाते हैं.  यह नाभि का बंधन हमारा जन्म जन्म का बंधन है

  • इसलिए यह बंधन प्राचीन है. संछेप  में यह कहा गया है कि (दशानन के) नाभि में अमृत है. आत्मा परमात्मा के  लिए तड़पती है.  अंततः आत्मा का उद्धार केवल परमात्मा ही कर सकते हैं. राम ही दशानन का वध करते हैं.

अपनी अंतरात्मा में हम सब यह  बात कभी न कभी जान जाते  हैं. रामकथा आत्मा से परमात्मा के मिलन, विछोह और पुनर्मिलन की  कथा है. इसलिए यह हम सब की  कथा है. इसलिए रामकथा हरेक प्राणी के अंतःकरण को छू जाती है.

रामकथा के आध्यात्मिक मर्म के बारे में यह मेरा दृष्टिकोण है.